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अब “दर्द” को भी जातियों में बांट दिया गया है!

पश्चिमी दिल्ली के कैंट क्षेत्र के नांगल गांव की एक 9 साल की नाबालिग दलित लड़की के साथ 4 लोंगों ने बलात्कार किया और हत्या करके जला दिया, आरोपियों में एक शमशानघाट का पुजारी भी शामिल है। पुलिस द्वारा लगातार मामले पर लीपापोती करने का प्रयास किया जा रहा है।

इस नृशंसतापूर्ण बलात्कार और हत्या ने आज पांच दिन बाद भी दिल्ली को नहीं जगा पाया है। जातिवादी मीडिया और तमाम तथाकथित समाज के ठेकेदार कुम्भकर्ण की नींद में सो रहे हैं। भीम आर्मी के दखल के बाद से दिल्ली पुलिस ने सम्बन्धित धाराओं में मामला दर्ज करके आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन अभी भी सबूतों को मिटाने और केस को कमज़ोर करके आरोपियों को बचाने की साजिश की जा रही है।

भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर आज़ाद के दिल्ली पीड़ित परिवार से मिलने के बाद दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल ने टवीटर के माध्यम से पीड़ित परिवार से मिलने की घोषणा किया और दूसरे दिन धरना स्थल पर जाकर पीड़ित परिवार को 10 लाख की आर्थिक सहायता करने का एलान किया जबकि 3 दिनों तक दिल्ली सरकार को इस हृदयविदारक घटना का एहसास ही नही हो पाया और न ही दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार से किसी ने मासूम के साथ हुई हैवानियत पर अपनी संवेदना व्यक्त किया।
आप को क्या लगता है पीड़ित परिवार के घर से उस मां के तड़पने की आवाज़ राष्ट्रपति भवन, पीएमओ और सीएमओ तक पहुंच नही पायी, नहीं इस आवाज़ को अनसुना कर दिया गया क्योंकि वह वाल्मीकि समाज की बेटी थी, वह तो लोंगों के घरों के सामने झाड़ू लगाने, उनकी गन्दगी उठाने के ही लिये पैदा हुई थी! उसके साथ बलात्कार होने, उसकी हत्या होने और जला देने से न इंसानों को कोई फर्क पड़ा और न ही व्यवस्था को, इससे बड़ा दुःख और क्या हो सकता है। मरने के बाद उस बेटी के साथ किया जा रहा भेदभावपूर्ण व्यवहार उस समाज का ही नही बल्कि उस बिटिया की पवित्र आत्मा का भी अपमान है जिसे अब उसकी बर्दाश्त कर रही है।

कल्पना करिए अगर इस घटना में आरोपी मुसलमान होते तो अब यह तथाकथित देशभक्त देश भर के मुसलमानों को बलात्कारी बता कर तांडव कर रहे होते लेकिन जब आरोपी उच्च वर्ग के होते हैं तो इनको सांप सूंघ जाता है। महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा का वादा करने वाले जातिवादी मानसिकता के लोग बगले झांकते नजर आते हैं।

यह कैसी बिडम्बना है कि “दर्द” को भी जाति और धर्म में बांट दिया गया है। दर्द अगर किसी उच्च वर्ग का है, किसी मंत्री, विद्यायक, नेता, अभिनेता या अमीर का है तो सबको एहसास होता है लेकिन दर्द अगर किसी गरीब, दलित और मुस्लिम का है तो किसी को एहसास ही नहीं होता है। लोग उसके प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करना भी ज़रूरी नही समझते हैं।
दिल्ली के नागल गांव में आज पांच दिन से दर्द से कराह रही एक माँ की पीड़ा का एहसास किसी को सिर्फ इस लिये नहीं हो रहा है कि वह गरीब है ? दलित समाज से हैं?
कहाँ गए मानवता और मानव अधिकारों की बात करने वाले ?
कहाँ चले गये महिला सुरक्षा और बेटियों को पढ़ाने और आगे बढाने का ढोंग करने वाले ? कहाँ मर गए एक हथिनी के मरने पर देश भर आंसुओं का सैलाब लाने वाले?
ऐसे वक्त में एससी, ओबीसी और माइनॉरिटी समाज के लोंगों को संगठित हो कर ऐसे दुख दर्द में नफ़रत, ज़ुल्म और ज़ालिम के ख़िलाफ़ न्याय के लिये आवाज़ बुलंद करने की आवश्यकता है।

सोचो!!! जब कोई चींटी मर जाती है तो उसके समाज के सारे लोग इकट्ठा हो जाते है। अगर किसी ने किसी कौवा को मार दिया तो उसके समाज के सारे लोग हंगामा खड़ा कर देते और हत्यारे को देखा होता है तो उसका पीछा आखिरी दम तक करते हैं। इस तरह जब जानवर, पक्षी और कीडे मकोड़े संगठित रह सकते हैं तो फिर हम सबसे समझदार और दिमाग वाले इंसान क्यों नहीं संगठित रह सकते है? (केडी सिद्दीकी, Email-editorgulistan@gmail.com)