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Media : ख़बरों से बेख़बर मीडिया, भटकता जा रहा है अपने नैतिक कर्तव्यों से

Media : ख़बरों से बेख़बर मीडिया, भटकता जा रहा है अपने नैतिक कर्तव्यों से

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ऐसे वक्त में जब पूरा देश महामारी से जूझ रहा है, तब देश का मीडिया झूठी खबरें प्लांट करने और अफ़वाह फैलाने में व्यस्त है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ जब नैतिक कर्त्तव्यों को भूल कर राजनैतिक दलों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से देश का सामाजिक सद्भाव और भाईचारा बिगाड़ने का प्रयास करने लग जाये तब लोकतंत्र की सुरक्षा भगवान ही कर सकता है। झूठी और पेड ख़बरो के चक्कर में मीडिया देश की वास्तविक स्थिति से समाज को अवगत नही करवा रही है। जिसके कारण देश भर में मीडिया की शाख को झटका लगा है। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि पत्रकारों को सरेआम दलाल और भड़वा कह कर सम्बोधित किया जाता है। न्यूज़ चैनलों की उपमा कुत्तों से दी जा रही है। कुछ पत्रकारों की भद्दी और शर्मनाक तस्वीर बना कर सोशल मीडिया पर मजाक बनाया जा रहा है। पत्रकारिता के लिये इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है ?

कोरोना महामारी में लॉक डाउन शुरू होने के बाद से देश के अलग अलग हिस्सों में लाखों बेसहारा मजदूर फंस गए है। जब उनके लिये रहने और खाने की कोई व्यवस्था नही हुई तो वह लोग हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के लिये पैदल ही सड़कों पर निकल पड़े। कई लोग भूख से मर गए तो कई लोग थक कर ज़िंदगी से हार गये, लेकिन वह लोग मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाए। ऐसे हालात में मीडिया ने न देश के हालात पर रिपोर्टिंग किया और न अर्थव्यवस्था और श्रमिकों के हालात पर चौपाल लगाना उचित समझा।

पूरे लॉक डाउन में मीडिया में बड़ी खबर सिर्फ तब्लीगी जमात रही। एमपी में 2000 से 3000 हजार लोंगों को संक्रमित करने वाली महिला अधिकारी खबर नहीं बन पायी, सैकड़ों लोंगों को संक्रमित करने वाला आगरा का डॉक्टर, दिल्ली के मजनू के टीला के गुरुद्वारे से निकले 1500 लोग, राजेस्थान में विदेश से आया और अपनी की तेरहवीं में भीड़ जुटा कर 1200 लोंगों को संक्रमित करने वाला, हरिद्वार और वैष्णव देवी में फंसे श्रद्धालुओं और महाराष्ट्र के एक धार्मिक स्थल में फंसे 3500 लोग मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाये। भूख से सड़क पर मरता हुआ मजदूर, बच्चे को गोद मे लेकर हजार किलोमीटर पैदल चलने के लिये निकली मजबूर माँ, दम तोड़ती इंसानियत और सुविधाओं के अभाव में देश की व्यवस्था संभाल रहे पुलिस, सफाईकर्मी, डॉक्टर्स और मेडिकल स्टॉफ खबर नहीं बन पाये। जिसका नतीजा यह हुआ कि आज भी लाखों लोग सुविधाओं के अभाव में कोरोना से लड़ रहे हैं लेकिन मीडिया के लिये ख़बर है तबलीग का मौलाना साद।

देश का लाखों नौजवान जो पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा है और पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहा है वह आज के इस युग की पत्रकारिता के नैतिक पतन से चिंतित है। पत्रकारिता के बदलते स्वरूप से लोकतंत्र के लिये खतरा बढ़ता ही जा रहा है। चिंता का विषय यह है कि पत्रकारिता के पतन पर कोई भी विद्वान, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और वरिष्ठ पत्रकार बोलने को तैयार नहीं है।

सुधीर चौधरी, दीपक चौरसिया, अमिश देवगन, अर्नब गोस्वामी, रुबिका लियाकत और रोहित सरदाना जैसे टीवी एंकरों ने अपनी आक्रामक और भड़काऊ पत्रकारिता से टीवी न्यूज़ चैनलों को भी धर्मो में बांट दिया है। 2013 के पहले हम टीवी पर सॉफ्ट और सुलझी हुई पत्रकारिता देखी है लेकिन अब टीवी चैनलों पर बैठ कर लोंगों को धमकाना, भद्दी भद्दी गालियां देना, मार पीट करना जैसी घटनाएं आम बात हो गयी है। अब न्यूज़ एंकर टीवी चैनल पर बैठ राजनैतिक दलों के प्रवक्ता की तरह कार्य कर रहे है। जिसके कारण ईमानदार और सॉफ्ट पत्रकारिता का पतन हो रहा है, क्योंकि हम अपने नैतिक कर्त्तव्यों से भटक गए हैं। लेखक: केडी सिद्दीकी, Email : editorgulistan@gmail.com

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